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कौन सुनेगा फ़रियाद...

Published 3 February 2021

Gavendra Deshmukh 3rd February 2021

बीजापुर जिले के भैरमगढ़ तहसील मुख्यालय में हाल ही में ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन की प्रमुख मांग इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित पुल निर्माण को रोकना तथा ग्रामीण इलाकों से पुलिस कैंप को हटाना था।

भैरमगढ़ से 7 किलोमीटर दूर ग्राम केशकुतूल में सीआरपीएफ कैंप बनने के बाद नक्सली वारदातों में कमी हुई है। गांव में कई परिवार हैं,  जो हिंसा से पीड़ित हैं। मालती पीड़ितों में से एक है। मालती और उसके परिवार को दोनों पक्षों से पीड़ा मिली है।

उनके पिता आयतु उरसे को साल 2006 में नक्सलियों द्वारा मार दिया गया। उनके पिता पूजा-पाठ के कारण आसपास के गांव जाया करते थे। एक बार पास के गांव से पूजा कर लौट रहे थे, रास्ते में उन्हें नक्सलियों द्वारा रोका गया। उनके पिताजी के साथ एक और ग्रामीण था जो मौके से भाग गया। उनके पिता वहां से भाग नहीं सके और उन्हें मार दिया गया। हिंसा से पीड़ित परिवार की सहायता हेतु कई प्रावधान हैं। मालती को स्कूल की पढ़ाई के लिए सरकारी मदद मिली।

पिता की मौत के बाद मालती अपनी पढ़ाई करने राजनांदगांव की डीपीएस गईं। वापस गांव लौट कर भाई की मदद से सरकारी नौकरी और अन्य सरकारी सहायता के लिए आवेदन भी किया। इसी दौरान जून 2020 में पुलिस ने मालती के भाई गणेश पर नक्सलियों की सहायता करने का आरोप लगाया और गिरफ्तार कर लिया। भाई की गिरफ्तारी के बाद मालती अपनी भाभी के साथ उनसे मिलने जेल भी गई लेकिन कोरोना की वजह से उन्हें मिलने नहीं दिया गया।

आयतु कि नक्सलियों द्वारा हत्या और उनके बड़े भाई गणेश की गिरफ्तारी के बाद आज उनका परिवार पूरी तरह से टूट गया है। गणेश के आंगन में एक बाड़ी (सब्जी उगाने की जगह) है। जब गणेश थे यहां हर समय सब्जियां और जरूरत की अन्य चीजें उगाई जाती थी। आज गणेश की बाड़ी सूख चुकी है।

गणेश के दो छोटे बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की। गणेश के दोनों बच्चे पढ़ने और खेलने की उम्र में मां और अपनी बुआ के साथ घर के काम में हाथ बटाते हैं। घर के खेत भी गणेश के जाने के बाद अब कौन सम्हालेगा। इस बार उन्होंने खेती भी नहीं की।

गणेश की मदद से नौकरी के लिए आवेदन भी किया है, अब तक इस विषय में कोई सहायता नहीं मिली है। नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर कम्युनल हार्मोनी द्वारा नक्सल पीड़ित छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है। मालती ने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया लेकिन कोई सहायता नहीं मिली।  गणेश की पत्नी गांव में मजदूरी कर अपना और बच्चों का पेट पाल रही हैं।

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