Victims Register

They brutally killed Masa...

Published 25 January 2021

Gavendra Deshmukh, Raju Rana 25th January 2021

बस्तर ज़िला, दरभा ब्लॉक के ग्राम - भड्डरीमहू, पंचायत - ककालगुर में नक्सलियों ने एक ग्रामीण की हत्या कर दी थी। ग्रामीणों और पुलिस का मानना है कि इस घटना को नक्सलियों ने अंजाम दिया।

मासा घटना के वक्त अपने परिवार के साथ था। घटना को अब 6 महीने हो चुके हैं। उसके पीछे आज भी उसका परिवार उस रात से उबर नहीं पाया है। मासा की पत्नी इडमें जो लगभग 35 साल की हैं, वह अब भी गांव में रहती हैं। उनके साथ उनके 3 बच्चे भी हैं। बड़ी बेटी जिसकी एक आँख खराब है। इनके अलावा 2 और छोटे बच्चे हैं। घटना के बाद इडमें अकेली ही इनका पालन पोषण करती हैं। वे समझती हैं कि अब घर का काम काजी हाथ उनके साथ नहीं है। मासा के जितना काम तो नहीं हो पाता, जैसे-तैसे जीवन को सम्हालने की कोशिश करती रहती हैं।

इडमें बताती हैं कि घटना के दिन भी हर रोज़ की तरह हम सब जंगल की ओर घूमने गए थे। वहां से सूखी लकड़ियां और जरूरत का सामान लेकर शाम घर लौटे। घर लौट खाना पकाया, साथ बैठकर खाना खाया और सब सोने चले गए। कमरे के एक कोने में तीनों बच्चे थे और एक कोने में हम दोनों लेते हुए थे।

देर रात अचानक कुछ लोग घर में आए और मासा को खींचकर बाहर ले गए। मैं पीछे गई तो उन्होंने मेरे हाथ रस्सी से बांध दिए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, कोई बात नहीं की। मैंने सब कुछ देखा। उन्होंने उसे बहुत बर्बरता से मार डाला। उन्होंने मेरे सामने उसके सर पर कुल्हाड़ी से हमला किया। उन्होंने उसे मारा और बिना कुछ कहे वहां से चले गए।

जो हो रहा था तब अजीब था। मैं जोर जोर से चीख रही थी, यहां से वहां दौड़ रही थी। बच्चे तब तक सोए हुए थे, मैंने उन्हें उठाया। मैंने चिल्ला-चिल्ला कर लोगों से मदद मांगी, कोई डर से सामने नहीं आया। अगली सुबह सब आए पुलिस भी आई। लोगों का मानना है नक्सलियों ने मासा को पुलिस मुखबिर होने के संदेह में मारा। घटना के बाद इडमें को थोड़ी सरकारी मदद भी मिली।

इस हिंसा ने इडमें से सब कुछ छीन लिया था। मासा जो एक मामूली किसान था, दिनभर खेतों और जंगलों में मेहनत कर घर चलाता था। बच्चे और पत्नी भी काम में हाथ बढ़ाते थे। अब इडमें चाहती हैं कि उसके बच्चे पढ़ें, वे गांव से बाहर पढें। उन्होंने अपने एक बच्चे का दाखिला लगभग 20 किलोमीटर दूर एक आश्रम शाला में कराया है। अभी स्कूल भी कोरोना की वजह से बंद है।

बच्चों को बाहर पढ़ाए जाने पर वे कहती हैं इसके दो कारण हैं- पहला कि यह मुफ्त है, खर्च नहीं होता और खाना भी स्कूल में ही होता है। घर रहने से खर्च भी बढ़ता है और बच्चे खेलने में लग जाते हैं, पढ़ाई नहीं करते। वह चाहती हैं कि उनके बच्चे बाहर खूब पढ़ाई करें और गांव आकर कोई नौकरी या काम करें। अपनी संस्कृति और घर में वापस लौटें।

वे कहती हैं दोबारा अगर वह आए तो क्या करना है, क्या कहना है कुछ समझ नहीं आता। बस यही चाहती हूं सब चैन से रहें, यह हिंसा और अशांति खत्म हो। जो मुझे और मेरे बच्चों को देखना पड़ा वह किसी के साथ ना हो। अगर ऐसा किसी के साथ भी होता है मुझे बहुत दुख होता है।

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