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पदयात्रा

Published 23 September 2020

"उतनूर, जिला आदिलाबाद, तेलंगाना में अगस्त 2018 में हुई बैठक में नई शांति प्रक्रिया की पहली गतिविधि के रूप में 2 अक्टूबर 2018 से आँध्रप्रदेश से बस्तर तक एक शांति पदयात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया गया | 2 अक्टूबर 2018 महात्मा गांधी की 150 जन्म जयन्ती समारोह के शुरुआत का दिन था जिसे इस काम को शुरू करने के लिए उपयुक्त दिन पाया गया | यह तय किया गया कि इस पदयात्रा की मुख्य जिम्मेदारी आँध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के वे आदिवासी साथी लेंगे जो उन इलाकों में रहते हैं जहां हिंसा का स्तर इन दिनों कम है |

शबरी गांधी आश्रमम, चिंतूरू, आँध्रप्रदेश के गांधीवादी बुज़ुर्ग साथी चंद्रशेखरन जी ने शांति पदयात्रा के शुरुआत के लिए उनके आश्रम का उपयोग करने की अनुमति दी | यद्यपि गांधी की 150 वीं जयन्ती से तालमेल रखते हुए पदयात्रा में 150 पदयात्रियों के शामिल होने की बात की गयी थी पर 1 अक्टूबर को शबरी गांधी आश्रमम, चिंतूरू, आँध्रप्रदेश में 200 से अधिक पदयात्री इकट्ठा हो गए |

उसी शाम माओवादियों ने एक पर्चा निकालकर शांति पदयात्रा का विरोध किया और स्थानीय लोगों से शांति पदयात्रा का विरोध करने का अनुरोध किया | पदयात्रियों में डर का माहौल था, वरिष्ठ साथियों ने जब तक माओवादियों से बातचीत नहीं हो जाती है तब तक पदयात्रा को स्थगित रखने का सुझाव दिया पर युवा साथियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया | उन्होंने कहा “हम यह पदयात्रा हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों की बेहतरी के लिए कर रहे हैं |

इस युद्ध में हम रोज़ मारे जा रहे हैं | नक्सली चाहें तो हमें भी मार दें और जिनको रुकना है वे रुकें पर हम लोग तो आगे जाएंगे” | भय के माहौल में शांति पदयात्रा की शुरुआत हुई, सिर्फ दो साथियों ने पदयात्रा में नहीं शामिल होने का निर्णय लिया | आँध्रप्रदेश के स्थानीय लोगों ने 200 पदयात्रियों का जमकर स्वागत किया और उनके भोजन आदि की व्यवस्था की | पर छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाके में प्रवेश करते ही माहौल बदल गया और लगभग कोई भी स्थानीय पदयात्रियों से मिलने नहीं आए और उनके भोजन की व्यवस्था भी नहीं की जैसा पहले तय हुआ था | पर यात्रा आगे बढ़ती रही और माहौल को फिर से बदलने में हफ्ते भर लगे |

एक हफ्ते बाद धुर माओवाद प्रभावित इलाकों में ही लोग यात्रियों का स्वागत करने लगे और भोजन की व्यवस्था आदि करने लगे | सड़क पर कई दुकानों ने पदयात्रियों को मुफ्त में सामान दिए और उनसे पैसे नहीं लिए 10 दिन बाद 12 अक्टूबर को जब पदयात्री जगदलपुर पहुंचे तो शहरवासियों ने भी पदयात्रियों का फूलों से स्वागत किया | वरिष्ठ गांधीवादी शिक्षाविद पद्मश्री धर्मपाल सैनी ने पदयात्रियों को भोजन कराया, उनके रुकने की व्यवस्था की |

पदयात्रियों ने शहर में अंतिम पड़ाव के रूप में बस्तर की महारानी से मिलकर कहा “जिस दिन बस्तर के महाराजा की ह्त्या 1966 में हुई तब से बस्तर में बुरे दिनों की शुरुआत हुई है” | उन्होंने महारानी से बस्तर में शांति लाने के इस प्रयास को आशीर्वाद देने का अनुरोध किया | इसके बाद बस्तर डायलॉग 1 की शुरुआत हुई जहां पदयात्रियों के साथ शहर के वरिष्ठ लोगों ने भी मध्य भारत में शांति कैसे लाएं इस पर अपने विचार रखे | दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की |

बस्तर डायलॉग 1 में जेल में बंद आदिवासी राजनैतिक बंदियों की रिहाई और बस्तर से पलायन कर आँध्रप्रदेश और तेलंगाना के जंगलों में दर दर की ठोकरें खा रहे बस्तर के आदिवासियों के पुनर्वास पर काम करने का निर्णय लिया गया | यह तय किया गया कि इन दोनों मांगों के लिए तीन माह बाद साइकिल से बस्तर से रायपुर जाकर सरकार से इसकी मांग की जाएगी "