Gavendra Deshmukh, Raju Rana, 15th Jan 2021
31 सितंबर की रात बीजापुर से जगदलपुर मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग 63) से करीब 100 मीटर की दूरी पर गोपाल कुड़ियम की उनके घर पर ही हत्या कर दी गयी। गोपाल कुड़ियम ग्राम छोटे गोंगला, पंचायत बड़े तोंगाली के निवासी थे। गोपाल का गाँव जांगला थाना से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर है। आपातकाल में थाने से 5 मिनट में ही पहुंचा जा सकता है।
कमला कुड़ियम जो गोपाल की पत्नी हैं, मितानिन प्रशिक्षक के तौर पर 2011 से काम कर रही हैं। कमला और गोपाल के चार बच्चे हैं।सबसे बड़ा रंजीत पास के गांव नैमेड़ से कक्षा 12वीं की पढ़ाई कर रहा है। सीमा जांगला से 12वीं की पढ़ाई कर रही है। बेटी कल्पना और सबसे छोटा बेटा अनुज भैरमगढ़ से क्रमशः दसवीं और आठवीं की पढ़ाई कर रहे हैं।
कमला बताती हैं- 31 सितंबर की रात गोपाल और कमला घर के पिछले आंगन की तरफ सोए हुए थे। बच्चे घर के अंदर थे। घर के सामने का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन कुछ लोग पीछे से सीधे आंगन में पहुंचे। जैसे उन्हें पहले से पता हो कि गोपाल कहां है। उनके आने से दोनों की नींद खुली।
वह उठाकर उन्हें बाहर की तरफ ले गए। तीन चार लोग थे, सबके चेहरे ढके हुए थे। उनके हाथों में फरसा, कुल्हाड़ी, पिस्टल जैसे हथियार भी थे। हम घर के बाहर ही थे और मैंने देखा कि आसपास और भी कई सारे लोग हथियारों के साथ खड़े हैं। संख्या में काफी ज्यादा लोग थे, मुझे अंदाजा हो गया था कि कुछ बुरा होने वाला है। वे मेरे पति को मुझसे थोड़ी दूर ले गए, एक आदमी मेरे सर पर बंदूक ताने खड़ा था। मैं अगर उनसे कुछ कहती तो बार-बार कुल्हाड़ी मेरे सर के पास लाते। मैंने उनकी मंशा देखते हुए पूछा कि आप लोग कौन हैं, क्यों आए हुए हैं। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उनसे यह भी कहा कि यदि आपको किसी ने इन्हें मारने के पैसे दिए हैं, तो वह पैसे हमसे ले लीजिए। हम जैसे तैसे भीख मांग कर भी आपको पैसे चुका देंगे, इन्हें मत मारिए। उन्होंने मेरी एक ना सुनी, मेरे पति के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट शुरू की। मारपीट से बचकर भागने की कोशिश में मेरे पति थोड़ा दौड़े और दरवाजे के पास आकर गिर गए। गिरते ही उन पर धारदार हथियारों से हमला हुआ। मेरे सामने ही उन्हें मार दिया गया।
मैं बेबस खड़ी देखती रही। आसपास के लोग भी अपने घर के पीछे छुप कर सब कुछ देख रहे थे। किसी ने पास आने की हिम्मत नहीं की। उनके जाते ही तुरंत मैंने पुलिस को फोन किया। पुलिस ने सीधे उस वक्त आने से मना कर दिया। पुलिस सुबह आई, उनके शरीर को पोस्टमार्टम के लिए ले गई। थोड़ी देर बाद उनके पार्थिव शरीर को वापस छोड़ दीया। घटना के कुछ दिन बाद नक्सलियों का पर्चा आया कि 'आपका पति पुलिस से मिला हुआ था। हमारी जानकारी पुलिस को दिया करता था इसीलिए उसे मौत की सजा दी गई है।'इस मामले में पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं।
कमला आगे कहती हैं- आज घटना को 3 महीने हो चुके हैं। किसी तरह की कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। जब बाह थे तो खेती का सारा काम वही देखा करते थे। इसके साथ-साथ अनाज पिसाई की मिल भी चलाते थे, जिससे घर का सारा खर्चा निकल जाया करता था। उनके जाने के बाद बहुत सारी समस्याएं आती रहती हैं। फसल बुवाई के समय के पैसे उधार थे। उसके बाद फसल कटाई और उसकी साफ-सफाई के पैसे देने के लिए मैंने अपनी नजर ननंद से ₹40000 उधार लिए। बच्चे भी पढ़ाई के सिलसिले में स्कूल से घर घर से स्कूल आना-जाना करते रहते हैं। उसके लिए भी पैसे लगते हैं। जिसके लिए मुझे बार बार सोचना पड़ता है।
मैं एक मितानिन प्रशिक्षक हूं। जितना काम करती हूं उतने दिन के पैसे मिलते हैं। अगर पूरा महीना काम किया तो लगभग 10,000 मिल जाते हैं। उनके जाने के बाद से किसी महीने 15 दिन किसी महीने 10-12 दिन ही काम हो पाता है। कई तरह के काम का जिम्मा अब मुझ पर ही है। काम में भी इसका प्रभाव पड़ा है। जिन गांवों में मुझे जाना होता है, वह भी घर से करीब 20-25 किलोमीटर दूर हैं। दो गांव ऐसे हैं जहां केवल गर्मी के मौसम में ही मोटरसाइकिल से जाया जा सकता है। मैं हमेशा अपने फील्ड में पैदल ही जाती हूं। जहां जाने में मुझे 3 घंटे लगते हैं। यदि फील्ड में केवल 2 घंटे का काम है तो उसमें मुझे सुबह से शाम तक का वक्त लग जाता है। 6 घंटे केवल पैदल आने-जाने में लगते हैं।
लोग सलाह देते हैं, यह जगह छोड़कर कहीं और चले जाओ। यहां घर है, परिवार है, बच्चों का भविष्य है छोड़कर कहां जाऊं। मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे जितना पढ़ सकते हैं पढ़ें, जो बनना चाहते हैं बने। मैं उनकी कमी तो पूरी नहीं कर सकती पर उनकी कमी का एहसास न होने दूँ मेरी पूरी कोशिश होगी।
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