Gavendra Deshmukh 1st February 2021
कड़ती नागेश बासागुड़ा में एसपीओ के रूप में कार्यरत थे। 2007 में बीजापुर होमगार्ड भर्ती में शामिल होने गए थे, भर्ती प्रक्रिया के बाद नागेश गांव लौट रहे थे। लौटते समय रास्ते में नक्सली उनकी जीत रोकते हैं, सभी से पूछताछ करते हैं। उन्होंने पूछताछ के बाद बाकी सब को जाने दिया और नागेश को रुकने कहा।जीप के जाने के बाद नक्सलियों ने धारदार हथियारों से उनका गला रेत कर हत्या कर दी।
नागेश के बड़े भाई चंदू बताते हैं, उनके मूल गांव धर्मपुरा, पंचायत मल्लेपल्ली की आबादी 500 के आसपास रही होगी। वहां लगभग 150 परिवार रहा करते थे। साल 2006 में नक्सली और पुलिस दोनों पक्षों से दबाव के कारण पूरा गांव खाली हो गया। उनमें से कुछ शिविर में रहने लगे, कुछ ने एसपीओ के रूप में काम करना शुरू किया और बाकी नक्सलियों के साथ चले गए। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो छत्तीसगढ़ छोड़कर पास के राज्यों में जाकर रहने लगे।
नागेश की हत्या के बाद चंदू को डर बना रहता था कि वे उन्हें भी ना मार दें। वह अपनी मां, पत्नी और बच्चों के साथ आवापल्ली शिविर में रहते थे। नागेश की मौत के बाद मुआवजे के रूप में उन्हें कुछ पैसे मिले, उन पैसों से चंदू ने आवापल्ली शिविर में घर बनाया। कुछ समय बाद उनकी माताजी चल बसी।
चंदू ने भाई की मौत के बाद नौकरी के लिए कई बार अधिकारियों से बात की, पर अब तक उन्हें नौकरी नहीं मिली है। उनके तीन बच्चे हैं, बड़ा बेटा बीजापुर आईटीआई से डिप्लोमा कर रहा है। उनका एक और बेटा बीजापुर में ही 11वीं कक्षा की पढ़ाई करता है और बेटी आवापल्ली के स्कूल में 11वीं कक्षा की पढ़ाई करती है।
चंदू मजदूर हैं वे बताते हैं कि स्कूल में पढ़ाई का पैसा नहीं लगता, लेकिन बच्चों के आने जाने में बहुत खर्च होता है। मजदूरी कर घर चलाना और बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं है। उनके बच्चे भी जरूरत पड़ने पर अपने आसपास कोई भी काम कर लेते हैं।
वे कहते हैं कि अगर हम गांव में रहते तो खेतीबाड़ी से थोड़ी मदद मिल जाती, यहां सारी चीजें खरीदनी पड़ती है। वे चाहते हैं कि यह हिंसा खत्म हो और वह अपने उजाड़ हो चुके गांव वापस जा सकें।
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