Victims Register

मैंने पढ़ाई छोड़ी ताकि अपने भाई बहन को पढ़ा सकूँ...

Published 31 January 2021

Gavendra Deshmukh, Raju Rana 31st January 2021

बीजापुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर सड़क किनारे जांगला गांव बसा है। बीजापुर के मुख्य मार्ग पर बसा यह गांव पहले सड़क से लगभग 2 किलोमीटर दूर हुआ करता था। सलवा जुडूम के बाद सड़क किनारे शिविर बनाए गये। उसके बाद पीड़ित परिवार अब यहीं बस गए हैं।

सलवा जुडूम की शुरुआत में सड़क किनारे के लोगों को जोड़ना शुरू किया गया। सड़क किनारे के गांव में सरकारी महकमे और पुलिस की पहुंच आसान थी। सड़क किनारे के लोगों पर सलवा जुडूम से जुड़ने का भारी दबाव था। जिलाराम लेकाम भी सलवा जुडूम में शुरुआत से जुड़े रहे। सलवा जुडूम समर्थन के कारण साल 2008 में उन्हें नक्सलियों ने मार दिया। उनकी मौत के सदमे से परिवार उबर ही रहा था की 2011 में उनकी पत्नी मूरी लेकाम को भी नक्सलियों ने सरे बाजार बंदूक और चाकू से मार डाला।

लेकाम की तीन पत्नियां थी और उनसे 10 बच्चे थे। उनकी पहली पत्नी मुरी लेकाम थी। उनकी दो पत्नियां और 10 बच्चे आज भी गोंगला में रहते हैं। उनके 10 बच्चों में सबसे बड़ी छमीला जी हैं जो कपड़ों की दुकान चलाती हैं साथ ही बीएससी नर्सिंग भी कर रही हैं। उनके बाद महेश जी जिन्होंने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी ताकि अपने से छोटे भाई बहनों को पढ़ा सकें। महेश और छमीला को नक्सलियों द्वारा पढ़ाई नहीं करने और पुलिस से न मिलने का दबाव रहता था। छमीला ने अपनी पढ़ाई के बारे में लोगों को नहीं बताया है।

छमिला और महेश ही परिवार चला रहे हैं। उनसे छोटी बबीता ने नवमीं करके पढ़ाई छोड़ दी। उनके बाद के छोटे भाई बहनों में मालती जो दुर्ग में बीएससी कर रही हैं, सरिता जो रायपुर में बीएससी कर रही हैं, मोनिका और वृंदा भैरमगढ़ स्कूल में पढ़ाई करते हैं, मंजू जांगला में ही रहकर नैंदेड़ में 12वीं की पढ़ाई करती है। हेमलता और सबसे छोटा प्रदीप दंतेवाड़ा की स्कूल में पढ़ाई करते हैं।

महेश बताते हैं कि सलवा जुडूम की शुरुआत में ही नक्सलियों ने बहुत सारे लोगों को अगवा किया था। उनमें महेश के पिता जिलाराम और उनके मित्र भुनेश्वर ठाकुर भी शामिल थे। पूछताछ कर नक्सलियों ने भुवनेश्वर ठाकुर को मार दिया। महेश के पिता को भी मारने की कोशिश की। जैसे तैसे वे वहां से जान बचाकर भागे। भागकर सीधे वह कैंप में रहने लगे। इस घटना से उनके शरीर में कुल्हाड़ी की चोटें थी उन्हें इलाज ले लिए जगदलपुर अस्पताल ले जाया गया। इलाज के बाद वह वापस आकर शिविर में रहने लगे

शिविर में लोगों को राशन और दैनिक जरूरतों का सामान दिया जाता था। कुछ समय बाद जब उन्हें लगा कि अब स्थितियां सामान्य हो चुकी हैं, उन्होंने खेती करने का फैसला किया। वापस गांव जाकर अपने खेतों पर  खेती शुरू की। 2008 की एक सुबह लगभग 7:30 बजे वह अपने खेतों पर हल चला रहे थे। तभी नक्सली वहां आए और उन्हें मार दिया। महेश बताते हैं कि उनके पिता के शरीर में सर से पांव तक गोलियां लगी थी उसके बावजूद उन्होंने कुल्हाड़ी से उनका गला रेत दिया। इस घटना के बारे में पता चलते ही लोगों ने पुलिस को खबर की। घटना के काफी समय बाद पुलिस वहां पहुंची। पहुंचने के बाद भी आसपास सर्चिंग या खोजबीन की कोई कोशिश नहीं की गई। लाश को उठाकर पोस्टमार्टम किया गया और परिवार को सौंप दिया गया।

इस घटना के 3 साल बाद महेश की मां जो एक स्व सहायता समूह की सदस्य थी। अपने समूह के लिए सामान खरीदने महेश के साथ पास के बाजार गई थी। सामान खरीदते वक्त महेश थोड़ी देर के लिए दूसरी दुकान से सामान खरीदने गए। अचानक गोली चलने की आवाज आई, आवाज सुनकर जब महेश अपनी मां की तरफ दौड़े तो देखा कि उनकी मां को ही गोली लगी थी। वह जमीन में गिरी हुई थी और कुछ लोग उन्हें घेरकर चाकू और कुल्हाड़ी से मार रहे थे।

महेश ने वहां से भागने की कोशिश की, उन्हें कुछ लोगों ने रोका और धक्का-मुक्की कर मारने का प्रयास किया। वह भाग निकला। भागकर सीएएफ कैंप में गए, वहां से ट्रैक्टर की ट्रॉली में छुपकर वे अपने गांव जांगला पहुंचे। पहुंचते ही सबसे पहले थाने गए और पुलिस को इस घटना की सूचना दी। सूचना दिए जाने के लगभग डेढ़ घंटे बाद पुलिस वहां से निकली। मौके पर महेश की मां अब तक ज़िंदा थी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया और अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।

महेश बताते हैं कि जब वे बाजार में लौटे तो उनकी मां उसी जगह तड़प रही थी। बाजार में कोई भी नहीं था बाजार का सारा सामान लूट लिया गया था। महेश कहते हैं कि अगर पुलिस समय में पहुंचती तो शायद उनकी मां को बचाया जा सकता था। मां और बाप के जाने के बाद महेश और उनके पूरे परिवार को आज भी डर रहता है। वह कहते हैं कि अगर वह गांव छोड़कर गए तो बाहर क्या करेंगे। गांव में जो खेत हैं उसमें महेश अब खेती करते हैं,  खेती के पैसे से अपने बड़े परिवार का पालन-पोषण व छोटे भाई बहनों की पढ़ाई का खर्च निकलता है। उन्हें डर रहता है कि वे और किसी अपने को न खो दें।वह गांव सिर्फ खेती के समय जाते हैं बाकी समय सड़क किनारे अपने घर में रहते हैं।

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