Victims Register

I don't want my son to die either...

Published 27 January 2021

Gavendra Deshmukh, Raju Rana 27th January 2021

जुलाई 2020 की एक दोपहर, कुटरू के बाज़ार में एक सहायक आरक्षक की सरेआम हत्या हुई। हत्या नक्सलियों द्वारा की गई थी। मृत आरक्षक का नाम सुरेश कुमरे था।

सुरेश मूलरूप से ग्राम- मंगापेटा, तह- भैरमगढ़, जिला - बीजापुर, छत्तीसगढ़ के निवासी थे। सलवा जुडूम की शुरुआत से ही वह हिंसा के खिलाफ खड़े हुए। बाद में सुरेश एसपीओ के रूप में काम करने लगे। सुरेश के गांव में थाना या सीआरपीएफ कैंप नहीं था। इस वजह से उन्हें 2006-07 के आस-पास गांव छोड़ना पड़ा।

सुरेश गांव छोड़ कर कुटरु शिविर में रहने लगे। जनवरी 2021 के बिजापुर प्रवास में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुटरु को तहसील बनाने की घोषणा की है। कुटरू शिविर में सुरेश सुरक्षित थे, क्योकि सामने ही पुलिस थाना था। उनके साथ उनकी पत्नी बायका और बेटा रमेश रहते थे। रमेश की शादी हो चुकी थी,  रमेश की पत्नी भी साथ रहती थी।

रमेश बताते हैं कि कुटरु से भैरमगढ़ मार्ग में आए दिन किसी न किसी पुलिस कर्मचारी को नक्सलियों द्वारा मारा जाता है। वे आगे बताते हैं,  उस दिन भी सब कुछ साधारण था। पिताजी सब्जी खरीदने बाजार गए हुए थे। अचानक कुछ लोगों ने उन्हें घेरा और मार दिया। यहां कुटरू के आसपास भी जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीने में हर रविवार किसी न किसी पुलिस वाले को मार दिया जाता था।

पिता के ना होने से रमेश ही अब परिवार के सर्वे सर्वा हैं। रमेश मजदूरी करते हैं। पिता के जाने के बाद रमेश की कमाई से ही घर का खर्चा चलता है। इसके अलावा घर के किसी काम के लिए उन्हें काम से छुट्टी भी लेनी पड़ती है। उन्हें पिता की जगह पुलिस में काम करने का मौका दिया गया। लेकिन बायका ने मना कर दिया। बायका का कहना है कि जिस वजह से मेरे पति की जान गई, मैं अपने बेटे को मरने नहीं भेजूंगी।

रमेश चाहते हैं कि उन्हें पुलिस के अलावा कोई दूसरी नौकरी मिल जाए तो शायद तकलीफें कम हों। रमेश अपनी नौकरी और मां के पेंशन के अलावा अन्य सहायता के लिए कई दफ्तरों के चक्कर काट चुके हैं।  उनके पिताजी की मौत को लगभग 6 महीने हो गए हैं, वह आज भी सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

Share on facebook Facebook Share on twitter Twitter Share on whatsapp WhatsApp