Victims Register

अब घर चला पाना भी मुश्किल है...

Published 10 February 2021

Sharat Chandra, 1th February 2020

ये कहानी है अंतागढ़ के महरूपत गाँव के निवासी मेघनाथ धुर्व की है, वर्तमान में ये अगस्त 2020 से जेल में है, इससे पूर्व 2008 और 2013 में सजा काट चुके थे, कोरोना महामारी के दौरन ये तीसरी बार है जब पुलिस घर से उठा कर ले गई है, उनके घर में पत्नी लक्ष्मीबाई और उनके 4 बच्चे है, घर में सास ससुर अलग रहते है, पुलिस ने उन्हे नक्सली सहयोगी के नाम पर गिरफ़्तार किया था |

पुलिस द्वारा वारेन्ट के नाम पर अगस्त 2020 में ले गई, कोई वज़ह नहीं बताया, घर में अकेले लक्ष्मीबाई धुर्वा और उनके 4 बच्चे रहते है, सास ससुर अलग रहते है इसलिए पेशी के दौरान वे अपने बच्चे को छोड़कर जाती है, उनके 3 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, इसलिए वह मजदूरी करती हैं ताकि बच्चे पढ़ाई कर सकें, घर में अर्थिक समस्या के बावजूद लक्ष्मीबाई अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं, इन 8 महीनों के दौरन उनको पति से भी नहीं मिलने दिया गया, पति जेल में है इसलिए लक्ष्मीबाई धुर्व अकेले खेती और घर को संभालती है,

वकील से जमानत कि गुहार लगाईं है लेकिन अदालत ने खारिज कर दी, लक्ष्मीबाई बताती है एक पेशी में करीब दस हज़ार रुपया ख़र्च हो जाता है, वे गाँव वालों से उधार लेती है, इससे पहले गहने बेच के गाँव वालों का पैसा चकाया था, वर्तमान में घरेलू काम करती है, लेकिन परिवार का भरण-पोषण नहीं हो पता है, वे प्रशासन से अपील करती है कि उनके पति को पहले सजा हो चुकी है उन्हें बरी किया जाए |

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