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साइकिल यात्रा

Published 23 September 2020

"22 फरवरी 2019 को 300 साइकिल यात्री फिर बस्तर की राजधानी जगदलपुर के मुरिया भवन में इकठ्ठा हुए, इसमें अधिक विस्थापित आदिवासी साथी थे जो 2004 में शुरू हुए हिंसक सलवा जुडूम आंदोलन के बाद अपने घर द्वार को छोड़कर किसी तरह जान बचाकर आँध्रप्रदेश और तेलंगाना के जंगलों में भागने को मज़बूर हुए थे | तब से ये साथी किसी तरह जंगल में पेड़ काटकर खेती कर और स्थानीय किसानों के यहाँ मज़दूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं |

किसी भी सरकार ने इन्हें आतंरिक विस्थापित लोगों ( इंटरनली डिस्प्लेस्ड पीपुल या आईडीपी) की तरह मान्यता नहीं दी है | आँध्रप्रदेश और तेलंगाना दोनों जगह इनको अनुसूचित जनजाति का दर्जा भी नहीं दिया गया है | कभी पुलिस वाले तो कभी वन विभाग के अधिकारी आए दिन जंगल में उनके घरों को तोड़ने और आग जलाकर उन्हें अपने घर छत्तीसगढ़ वापस जाने को कहते हैं पर उनके पास वापस जाने को घर नहीं है इसलिए थोड़े दिनों बाद वे फिर उसी जगह आ जाते हैं और फिर नयी झोपड़ी बनाते हैं आँध्रप्रदेश और तेलंगाना में ऐसे 248 से अधिक बसाहटे हैं जहाँ छत्तीसगढ़ से पलायन किए आईडीपी साथी पिछले 15 सालों से जंगलों में रहते हैं |

इनमें ऐसे कई बसाहट हैं जिन्हे एक दर्जन से ज़्यादा बार तोड़ या जला दिया गया | पर ये आईडीपी साथी कहते हैं “हम यहां दिक्कत में हैं, पर ज़िंदा तो हैं | यहाँ जीवन बहुत कठिन है पर दो रोटी कम खाना गला कटवाने से बेहतर है” | इनमें से अधिकतर अगर संभव हो तो आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में ही रहना चाहते हैं यदि उन्हें जिस ज़मीन पर वे अभी खेती करते हैं उसका पट्टा मिल जाए और सरकार यदि उनको अनुसूचित जनजाति की सूची में जोड़ ले जिससे उन्हें अनुसूचित जनजाति को मिलने वाली सुविधाएं मिल सके |

खासकर युवा वर्ग के साथी जिनका जन्म ही विस्थापन के बाद हुआ या उनका बचपन आँध्रप्रदेश और तेलंगाना में बीता उनका छत्तीसगढ़ में अपने घर से अधिक लगाव नहीं है पर साइकिल यात्रा के अंत तक उनमे से काफी का मन बदल गया साइकिल यात्रा पर भी माओवादियों का पर्चा आया और इस बार उन्होंने सर्व आदिवासी समाज पर शांति प्रक्रिया का नेतृत्व करने के लिए हमला बोला और इस यात्रा में जुड़े लोगों को सरकार और कॉर्पोरेट का एजेंट बताया और पदयात्रा की तरह स्थानीय लोगों से साइकिल यात्रा का बहिष्कार करने का आव्हान किया पर साइकिल यात्रा जगदलपुर से रायपुर के बीच चूंकि ऐसे इलाकों से गुज़र रही थी जहाँ माओवादियों की अधिक उपस्थिति नहीं है इसलिए पिछली बार की तरह यात्रियों पर कोई असर नहीं पड़ा |

इस बार लगभग पूरे रास्ते में स्थानीय लोगों और संस्थाओं ने यात्रियों के लिए भोजन की व्यवस्था की | पर राजधानी रायपुर पहुँचने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल साइकिल यात्रियों से नहीं मिले पर बस्तर से मंत्री कवासी लकमा मिलने आए पर उन्होंने आईडीपी साथियों को पुनर्वास का कोई वादा नहीं किया | उन्होंने कहा कि ये लोग वापस नहीं आना चाहते | साइकिल यात्रा के दौरान लगभग 50 युवाओं ने कहा कि सरकार यदि उन्हें शांत इलाके में पुनर्वसित कर वन आधारित ग्रामोद्योग लगाने में मदद करेगी तो वे वापस आना चाहेंगे |

आईडीपी के साथ लम्बे समय तक काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा “यद्यपि अभी कोई नहीं बोल रहा पर लगभग आधे लोग किसी सुरक्षित जगह पर वापस आना चाहेंगे यदि छत्तीसगढ़ सरकार उनकी मदद करे” |

साइकिल यात्रा के अंत में यात्री छत्तीसगढ़ की राजधानी नया रायपुर के कुरु बंजारी गाँव में 1 और 2 मार्च 2019 को दो दिवसीय बस्तर डायलॉग के लिए बैठे | सबसे पहले सभी साथियों ने आदिवासी राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिए नई समिति बनाकर उस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ की नई कांग्रेस सरकार का धन्यवाद किया जो शांति पदयात्रा के बाद बस्तर डायलॉग 2 की पहली मांग थी | वनाधिकार क़ानून के कुछ विशेषज्ञों ने बताया कि उस क़ानून की अदला बदली की धारा का उपयोग कर आईडीपी साथियों को उनके पुराने गाँव के जंगल के ज़मीन के बदले शांत जगह ज़मीन दिलाया जा सकता है जैसा वे मांग रहे हैं |

पर देश में वनाधिकार क़ानून की इस धारा का किसी ने अब तक उपयोग नहीं किया है जबकि वनाधिकार क़ानून देश में 2006 से लागू है | विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि इस कानून को लागू करने के लिए नियम भी अब तक नहीं बना है जिसके बगैर इस क़ानून को लागू नहीं किया जा सकता | तो इस काम को नई शान्ति प्रक्रिया का पहली प्राथमिकता वाला काम बनाया गया तीन सौ में से 9 साइकिल यात्री आँध्रप्रदेश के कन्नापुरम गाँव से थे |

वे उस गाँव में पिछले 15 साल से आईडीपी की तरह रह रहे हैं | उन्होंने कहा “हम अपने मूल गाँव छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के मरईगुड़ा वापस जाना चाहते हैं अगर आप सब मदद करें” | बस्तर डायलॉग-3 ने इस काम को प्राथमिकता में रखना तय किया | इसके बाद वनाधिकार कानून के अदला बदली में भूमि के अधिकार को आईडीपी साथियों के लिए भी लागू करवाने को दूसरी प्राथमिकता में रखा गया | तीसरी प्राथमिकता अबुझमाड़ के अबुझमाड़िया अति पिछड़े जनजाति समूह ( पीवीटीजी) को हैबिटेट या पुनर्वास का अधिकार दिलाने के काम को रखा गया |

अबूझमाड़ आज माओवादी आंदोलन का मुख्यालय है और बस्तर डायलॉग-3 में साझा किए गए सभी की सम्मिलित समझ के अनुसार अबुझमाड़िया अपने जंगल को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्हें अगर शांतिप्रिय तरीके से ही वह मिल सकता है तो हमें उसमें मदद करनी चाहिए "